My first Poem… “Karm Path”

हर दिन निडर हो,
चल कर्म पथ पर,

सवेरा सोच कर ये हो,
अंत हो आज तो, रहे ना कुछ मंच पर,

डार हैं समाज से,
डर हैं अपने अंदर,

छोड़ मत समाज को
कर उसकि भी कदर,

कदर् हैं समाज से,
उससे ही पहचान अगर,

झांक अपनी सोच में,
परिवर्तन उस पर ही कर,

साथ अपनों का हो,
उससे हैं आसान सफर,

रोक मत समाज को,
उसके बहुत मुख मगर,

आईना समाज का हो,
उसपर सोच हो निरंतर,

तुझे अगर बैर हो,
बात कर, खुल कर, मिल कर,

विचार अगर ना मील,
उनहे मिला बैठ कर,

मिल जाते विचार तो,
समाज होता केसै पर्रसपर,

रासते कठिन हैं ये,
अकेले हैं मुश्किल डागर,

साथ अगर सब चले,
कट जाये ये मुसकुराकर,

और मुसकान ही तो ये,
निरभर सिर्फ आज पर,

तो उठ खढा और जान ये,
कि आज मे और अभी मे हैं,
जिंदगी का ये लांबा सफर…..

dedicated to the ‘one’ who is the most indispensable person in my life, most near to my heart and dearest to me….

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